बहादुर पाठ कहानी :अमरकांत सारांश और वस्तुनिष्ठ प्रश्न 

  बहादुर पाठ कहानी सारांश 

बहादुर पाठ कहानी : अमरकांत बहादुर (कहानी )| Bahadur path ke lekhak kaun hai | बहादुर पाठ सारांश 


बहादुर पाठ वस्तुनिष्ठ प्रश्न 

बहादुर पाठ वस्तुनिष्ठ प्रश्न 

Bahadur Path Sarans 

1. बहादुर पाठ के लेखक कौन है ? 

उत्तर : बहादुर पाठ लेखक अमरकांत है | 

2. अमरकांत का जनम कब हुआ था ? 

उत्तर : अमरकांत का जनम 1925 में हुआ था | 

3. अमरकांत का जनम कहाँ हुआ था ? 

उत्तर : अमरकांत का जनम नागरा , बलिया ( उत्तरप्रदेश ) में हुआ था | 

4. अमरकांत को कथा लेखन के लिए कौन साहित्य अकादमी पुरस्कार ‘ मिला था ? 

उत्तर : अमरकांत को कथा लेखन के लिए अकादमी पुरस्कार भी प्राप्त हुआ |


  बहादुर पाठ कहानी सारांश 

लेखक अमरकांत की प्रस्तुत कहानी में मझोले शहर के नौकर की लालसा वाले एक निम्न मध्यवर्गीय परिवार में काम करने वाला बहादुर कहानी है |  एक नेपाली  गवार गोरखे की परिवार का नौकरी पेशा मुखिया तटस्थ स्वर में बहादुर के आने और अपने सवछंद निश्छल आत्मीयता के साथ नौकर था |  वह गंभीर काफी हो गया था | और ऐसा लग रहा था उस व्यक्ति हो होना चाहिए | वः अपनी आखो को बुरी तरह से मलका रहा था उसका उम्र लगभग बारह तरह वर्ष का था | और नाह शरीर से चिकना गोरा चकइठा और गोरा रंग और चपटा था | और वह अपनी गले में स्कॉउट की तरह वह रुमाल बांधा हुआ था |  उसके परिवार केघर के कई लोग खड़ा था | और निर्मला चमकती आखो से वह कभी वह अपनी भाई को देखता है और वह लड़को के देखता है और कभी मुझको देखता है और निश्चित ही वह पांच के बराबर हो गया था | और उस व्यक्ति को उसके सला साहब ने लाया था | और उनको बहुत जरुरी हो गया था नौकरो को रखना कई करने से और उसके रिस्तेदार और भाई के पास भी नौकर था और अच्छे ओहदे पर उन सब थे जब लेखक अपने बहन की सदी वह गया तो देखा की नौकर के सुख है | और उनके भाभी रानी की तरह बैठकर चारपाइयाँ तोड़ती थी जब निर्मला को सुबह सक्षम तक उसको खटना पड़ता था तो उसे ईस्वर का याद आता था | और उसके बाद नौकर पर वापस आया था तो निर्मला 2 जून नौकर चालक की वह माला जपने लगा |  और उसने सोचा की उसके जैसा अभागिन और दुःखी महिला और इस दुनिया में और वेलोग दूसके के होते है और     उनके भाग में नौकर का नशीब होता है यह उसने ऐसा सोचा और वह नेपाल का था  जो बिहार के सिमा नपाल में था | और उसके पिता का मृत्यु एक युद्ध में हो गया था | और माता अपने सारे परिवार का भरण पोषण करने में वह असमर्थ था \ और माता उनका बहुत गुसैली थी | और बहादुर को वह बहुत मरता था | और बहादुर की माता चाहती थी की वह  अपने घर में काम धाम में हाथ बढ़ाये | और जब बहादुर अपने घर से पहाड़ पर या जंगल में जाता था | तो वह पेड़  पर चिड़िया – पक्षी के घोसला में से उसका बच्चा निकालकर खेलता था  और वह फल को तोड़कर  खता था |  और कभी – कभी बहादुर पशु को चराने के लिए जाता था और बहादुर ने उस जानवर को खूब मारा था | जिसको उसकी माँ बहुत प्यार से पोस्ती थी  और बहादु की मर खाकर उसका भैस भागे – भागे उसकी माँ के पास चला गया है और बहादुर  की माँ कुछ दूर पर वह खेत में काम कर रही थी  और बहादुर की माँ का माथा ठनका और बोला की बेजुवान जानवर चरना  छोड़ कर क्यों आया है | और उसकी माँ ने सोचा की  जरूर वह लौण्डा ने इसे मारा होगा | और वह गुससे में पागल हो गई | जबहादुर घर आया तो उसकी माँ ने अनुमान लगाया की भैस की एक डंडे से बहादुर को वह भैस की दुगना पिटाई की की वही कराहता घर छोड़कर लौट आई |  और बहादुर का मन अपनी माँ फट गया था  और वह घर से भाग कर रत भर जंगल में छिपा रहा और सुबह हुआ तो वह घर पंहुचा और किसी -न -किसी तरह से चोरी चुपके से घर में वह घुस गया | और वह माँ की घी वाली हाड़ी में से दो रूपया निकालकर बहादुर अपने  घर से भाग गया |


और छः मीटर की दुरी पर बस स्टेण्ड था जो की गोरखपुर जाने वाली थी | 

और लेखक ने पूछा की तूम्हारा नाम कया है 

उसने कहा की दिलबहादुर साहब 

और उसने कहा की हमारे घर में नौकर को बहुत इज्जत ओट सम्मान से रखा जाता है और जो लोग खाते पहनते है और वही नौकरो को भी खाने पहनने को मिलता है | और वह यहाँ रह जायेगा तो ढंग सऊर भी सिख जायेगा  और सभी कच्चे की तरह पढ़ना लिखना सिख जायेगा और उसका जिंदगी भी सुधर जायेगा और उसी समय निर्मला ने उसे व्यवारिक दे डाला था | की मुहल्ला में बहुत सारा तुच्छ आदमी है और वह किसी को काम नही  करेगा  और कोई कुछ सम्मान लेन को कहे तो  कहना आता हूँ कहकर खिस्क जाना और भी बाटे निर्मला ने बहादुर को बता दिया था | और उसके  नाम में दिल  हटाकर बहादुर रखा था | बहादुर बहुत हॅसमुख और मेहनती था | और बहादुर की वजह से उसकी घर में कुछ दिन तक ऐसा उत्साहपूर्ण वातावरण छा गया था और ऐसा लग रहा था की तोता मैना या पिल्ला पलने पर ऐसा लागता है | और सुबह में ही मोहल्ले के छोटा बच्चा आकर  बहादुर से तरह -तरह के प्रश्न पूछते थे | और हस्ता था | और निर्मला ने पड़ोसियों को सुनकर कहता था की बहादुर नास्ता क्यों नहीं कर लेते हो | और कहती थी की मै दूसरे औरत की तरह नहीं हु जो नौकर को जलती भुनती है मै नौकरो को भी अपने बच्चे की तरह रखता हु और महीना मे भले ही सौ डेढ़ सौ खर्चा हो लेकिन पर उसको जरा भी तक्लिप नहीं होने देते हु 

निर्मला बहादुर से पूछती थी की बहादुर तुमको अपनी माँ की यद् आता है | तो वह कहता नहीं – नहीं वह मुझे  मरती थी क्यों | और बहादुर इतना कहकर बहुत हस्ता था | जैसा की मर खाना खुशीब की बात हो | 

फिर अपना पैसा माँ के पास भेजने को क्यों कहते हो  ?और माता  पिता की कर्जा जीवन भर भरा जाता है ? वह और भी हस्ता था |  बहादुर आइना निकलकर मूंछ को बंदर की तरह कहता था ? और ताश की हडडी  गोलियाँ खेलता था और गुनगुनाता था |


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